मंडली

बे-कार – भाग:1

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बाहर से पोस्टमैन की आवाज़ आते ही शैलेश जी बाहर की तरफ लपके और पोस्टमैन से लिफाफा लि उस लिफ़ाफ़े को उलटते-पलटते भीतर आकर हाल में सोफे पर टिक गए। पत्नी ने पूछा भी कि किसकी चिट्ठी है लेकिन उस लिफाफे को खोलने में व्यस्त शैलेश को कुछ सुनाई ही नहीं दिया। लिफाफा फाड़कर शैलेश जी ने पूरा पत्र पढ़ा और पत्र के अंत तक पहुँचते-पहुँचते उनकी मुस्कान चौड़ी होती गयी। खुशी से नाचने का मन कर रहा था, आनंद हृदय में नहीं समा रहा था। किसे बताऊँ किसे न बताऊँ कुछ समझ नहीं आ रहा था। वो तुरंत अंदर गये और पत्नी एवं बच्चों को सारी बात बता दी। सारा वातावरण आनंदमय हो गया।

शैलेश जी एक 45-50 के बीच के व्यक्ति थे और पेशे से एक सरकारी शिक्षक थे। निकट के एक गाँव में ही पदस्थ थे और सरकार से अच्छी खासी तनख्वाह पाते थे जो हमेशा से ही उनके लिए नाकाफी रहती थी। गाँव के लोग उन्हें कहकर माड़साब बुलाते थे।

… हाँ तो बात उस लिफ़ाफ़े की हो रही थी। पिछले 1-2 सालों से माड़साब के दोनो बच्चे और विशेषकर पत्नी उनके पीछे पड़े थे कि कार खरीद लो।  अब एक  मध्यमवर्गीय के लिए कार लेना कोई मामूली बात तो है नहीं। 3-4 लाख का खर्चा है और कार की कोई ऐसी बहुत जरूरत  है भी नहीं। लेकिन बड़े लड़के को अपने कॉलेज के दोस्तों पर रौब झाड़ने के लिए, छोटी को अपने स्कूल की सहेलियों को जलाने के लिए और पत्नी को मायके में अपना दबदबा बनाने के लिए कार  की जरूरत थी । बच्चों को तो माड़साब जैसे-तैसे टाल जाते थे, किन्तु पत्नी से निबटना मुश्किल था। माड़साब का ससुराल पक्ष अर्थ की दृष्टि से भारी था। अर्थ से भारी होने का अर्थ यही था कि उन्हें पत्नी की बातों का वही अर्थं निकालना होता था जो वो सही समझती थीं। माड़साब के दोनों सालों ने पिछले साल कार ले ली थी। इससे उन पर कार खरीदने का अतिरिक्त दबाव बन गया था। इस दबाव के चलते माड़साब ने थोडा-थोडा करके तीन लाख रूपये अलग से जमा तो कर लिए थे लेकिन उनको एक साथ खर्च करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे।

“कोई ऐसा जुगाड़ लग जाये कि जिससे पैसा भी कम लगे और कार भी आ जाये।“

लोन के बारे में भी उन्होंने काफी विचार किया लेकिन उसके ब्याज का ध्यान आते ही यह विचार उन्होंने त्याग दिया। सेकण्ड हैण्ड कार भी उन्होंने कई देखी लेकिन कहीं भी बात नहीं जमी। अक्सर मित्रों और रिश्तेदारों के साथ उनकी बातचीत का विषय भी यही होता था। एक दिन उनके एक मित्र ने उन्हें बताया कि ऐसी बहुत कॉम्पिटिशन और स्कीम है जिनमे ईनाम में कार दी जाती है और उसके किसी रिश्तेदार को कार ईनाम में खुली भी है। माड़साब के लिए ये खबर रेगिस्तान में पानी की बूँदों की तरह थी। एक हल्की संभावना थी लेकिन थी तो। अब ऐसे कॉम्पिटिशन और स्कीम  माड़साब का जूनून बन गये। 6 महीनों की तपस्या के बाद यह दिन आया था। पत्नी और बच्चों के कई उलाहनों और तानो के बाद तो उनका भी आत्मविश्वास डिग गया था। लेकिन यह लिफाफा आज उनकी तपस्या के फल के रूप में उनके सामने था। उन्हें सच में ईनाम में कार खुल गई थी। उनके हाथ में जो लिफाफा था, वो उसी का कंफर्मेशन लेटर था। उन्हें कार लेने के लिए मुम्बई बुलाया गया था।

पत्र पर लिखे नंबर पर बात करके उन्होंने सारी बात पता की। खबर सही थी और चार दिनों के भीतर उन्हें कार लेने मुम्बई पहुँचना था। इतनी जल्दी कैसे पहुँचा जाये, मुंबई यहाँ से 800 किमी दूर है। माड़साब की ख़ुशी का स्थान क्रोध ने ले लिया था और उसका निशाना बना डाक विभाग  क्योकि वो पत्र 15 दिन पहले निकला हुआ था। “निकम्मे कहीं के एक पत्र भी ठीक से नहीं पहुँचा सकते, कभी यहाँ की डाक वहाँ और वहाँ की डाक यहाँ और अभी तो हद कर दी। पूरे 15 दिन बाद डाक मिली। आखिर सरकार तनख्वाह किस बात की देती है, सब सरकारी कर्मचारी एक जैसे होते हैं।  प्राइवेट कुरियर देखो, कितनी जल्दी आ जाते है।” तभी उन्हें याद आया कि वे खुद भी तो सरकारी कर्मचारी हैं। उन्होंने अपने आप को जब्त किया और अपने लड़के को बुलाकर उसके स्मार्ट फोन में 10 रूपये का नेट रिचार्ज करवाया और मुम्बई जाने वाली गाड़ियों के रिजर्वेशन देखने के लिए कहा ।

उन्होंने मन में विचार किया, ” वहाँ जाना तो ठीक है लेकिन आते समय कार चलाकर लानी होगी और मुझे कार चलानी आती नहीं।” तभी उन्हें अपने स्कूल वाले गाँव के बाबूलाल का ध्यान आया जो आज ही उन्हें रास्ते में ट्रेक्टर चलाते हुए मिला था। ” हाँ ! वही ठीक रहेगा। ट्रेक्टर चलाना आता है तो कार चलाना तो आता ही होगा और उसका खर्चा भी कम लगेगा। कोई दूसरा ड्राईवर होगा तो पैसे भी बहुत ले लेगा।”  उन्होंने तुरंत उसे फोन लगाया। मुम्बई का नाम सुनते ही वो तुरन्त तैयार हो गया कि दो दिन के अच्छे खाने पीने और मेहनताने पर बात पक्की हो गई। माड़साब अपने चातुर्य पर स्वयं ही रीझ गए।

तभी लड़के ने आकर बताया, “पापा स्लीपर में कहीं सीट खाली नहीं है। केवल एक ट्रेन में सेकंड AC में जगह खाली है वो भी तत्काल में, क्या करना है?” माड़साब विचार में पड़ गए फिर सारा क्रोध रेलवे, बढ़ती आबादी और सरकार को भला बुरा कहने में खर्च किया। सेकंड AC में जाने का मतलब था दो व्यक्तियो का लगभग 5000 का टिकट। सामान्य परिस्थियों में तो माड़साब के लिए ये असंभव था, लेकिन अभी कोई चारा नहीं था।  मरता क्या ना करता, जाना तो था ही । उन्होंने लड़के को अपना ATM थमाकर रिजर्वेशन करवाने को कह दिया।

अगली रात वे ट्रेन में थे। एक लोअर बर्थ पर माड़साब थे और सामने लोअर बर्थ पर बाबूलाल दीवार से टीककर अधलेटा सा था । वो हर थोड़ी देर में उठकर टॉयलेट जाता फिर वापस आकर बैठ जाता। काफी देर तक यह क्रम चलता रहा था। एक ख़राब से हरे रंग की कोल्डड्रिंक की बोतल जो वो घर से साथ ही लाया था, साथ लेकर बैठा हुआ था। ज्यादा बोलता-चालता वो था नहीं। हल्की सी दुर्गन्ध भी डिब्बे में महसूस हो रही थी। माड़साब उसकी हरकतों को समझने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन उन्हें कुछ समझ  में आया नहीं। उन्हें ज्यादा परवाह भी नहीं थी क्योकि वो तो कार के ख्यालों में खोये हुए थे। कल उन्हें बहुत काम भी था। इसलिए वो कम्बल ओढ़कर तुरन्त सो गए।

सुबह जब उनकी नींद खुली तो देखा की बाबूलाल सीट से आधा नीचे लटका हुआ है। उन्होंने हिला कर उसे जगाया। वो जैसे ही जागा, बिना बोले चाले मुँह पर हाथ रखकर तुरंत टॉयलेट की तरफ भागा। माड़साब भी उसके पीछे भागे, वो जोर जोर से उल्टी करने लगा। फिर अपनी सीट पर आकर बैठ गया। कुछ देर बाद उसने वही प्रकिया दोहराई, तीन चार बार वही घटना होने पर वो निढाल हो गया और अपनी सीट पर लेट गया।

इस बार माड़साब ने क्रोधित होकर पूछा, “बताता क्यों नहीं कि क्या हुआ है? क्या खाया था रात को? ” तब उसने भयभीत होकर इशारे से बताया कि रात भर वो शराब पीता रहा। ” हे भगवान! रात भर तू शराब पीता रहा और मुझे पता तक न चला। ”  माड़साब को रातभर की हरी बोतल की सारी कहानी समझ आई  और अपनी समझ पर पर्दा पड़ने के कारण स्वयं पर क्रोध भी आया। लेकिन अब जो होना था,सो हो चुका था। धीरे धीरे बाबूलाल की तबीयत बिगड़ने लगी। उलटी के साथ साथ उसे दस्त भी शुरू हो गए और बुखार भी चढ़ गया। शायद वह कच्ची शराब पी गया था और अभी मुम्बई पहुँचने में एक-डेढ़ घण्टा और लगने वाला था।

मुम्बई पहुचने तक बाबूलाल की हालत और भी ख़राब हो  गई। प्लेटफार्म पर उतरने पर वह अपने पैरों पर खड़ा भी नहीं रह पा रहा था। माड़साब घबरा गए कि कही कुछ ऊँचा-नीचा हो गया तो क्या जवाब देंगे। शहर भी नया है, कहाँ जाये कुछ समझ नहीं आ रहा था। माड़साब बाबूलाल को कंधे का सहारा देकर स्टेशन से बाहर तक लाये और एक टैक्सी वाले को इशारा करके पास बुलाया।

टैक्सी वाले ने तुरंत स्थिति भाँपी और पूछा,  ” काय झाल साहेब।”

“अरे हम मराठी नहीं समझते ” माड़साब झल्लाए।

 “अच्छा! क्या हुआ साहब?”

“ट्रेन में मेरे साथी की तबियत ख़राब हो गई है, हमें जल्दी से सरकारी अस्पताल तक छोड़ दो।”

टैक्सी ड्राईवर हँसा, “सरकारी अस्पताल में इनको तो छोड़िये, शायद वहाँ से आप भी ठीक से वापस न आ पायें। आप कहे तो पास ही एक अच्छा नर्सिंग होम है, वहाँ आपको छोड़ दूँ।”

माड़साब को उसकी बात ठीक ही लगी। बाबूलाल को लेकर वो कोई जोखिम नहीं लेना चाहते थे। उन्होंने टेक्सी ड्राईवर की बात मानने में ही भलाई समझी।

माड़साब ने बाबूलाल को वहाँ भर्ती करवाकर सारी कार्यवाही पूरी की और फिर उसे आकर कहा, “डॉक्टर साहब शाम तक तुझे यही रखेंगे तू यहीं आराम कर मैं शोरूम जाकर कार की फॉर्मलिटी पूरी करता हूँ। जब तुझे कुछ बेहतर लगे तो तुझे ले जाकर कार ले आएंगे। तब तक कुछ गड़बड़ मत करना। मैं शाम तक वापस आ जाऊंगा।”  बाबूलाल ने सहमति में सिर हिलाया।

वहाँ से माड़साब लोगों से पूछते-ताछते बेस्ट बस और लोकल ट्रेन में सफ़र करते हुए नियत स्थान पहुँचे। “टेक्सी से जाकर क्या करना था, आखिर जल्दी किसे थी? वैसे भी बाबूलाल के अस्पताल का जो बिल आएगा उसे भी धीरे-धीरे ऐसे ही एडजस्ट करना पड़ेगा। बाबूलाल के घरवाले से अस्पताल का बिल तो माँग नहीं सकते। यही सोचते विचारते माड़साब शोरूम में घुसे और रिसेप्शनिस्ट को सब हाल बताया। रिसेप्शनिस्ट ने उन्हें संबंधित अधिकारी के पास भेज दिया।

क्रमश: …

लेखक – @fictionhindi और आशीष सोनी

 

 

 

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