मंडली

बकैती बंगले पर

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हमारे देश में माननीय गण, धन्ना सेठ और बड़े-बड़े साहेब-सुबा लोग बंगलों में रहते हैं। शेष लोग घर, फ्लैट, चॉल, झोंपड़ी या खोली इत्यादि में गुजरा करते हैं, कुछ फुटपाथ पर भी। बंगले से इनलोगों का वास्ता ‘बंगले के पीछे …’ गीत भर सुनने का होता है। बिहारी थोड़े अलग होते हैं, चंपारण में डिजाइनर टैप दिखने वाली झोंपड़ी बनाकर लोग उसे बंगला कहकर बंगले में रहने की हिरिस बुता लेते हैं। धन्ना सेठ और साहेब-सुबा बंगलापति बनने के लिए परिश्रम करते होंगे लेकिन माननीय गण बंगले में पहुँचने के लिए कलात्मक लोकतांत्रिक उद्यम करते हैं। इसलिए वे बंगले में रहते हुए उसका पाई-पाई वसूल करते हैं। वसूली में कोई कसर शेष रह जाने पर वे बंगले का न्यूनतम किराया, बिजली, पानी और फोन का बिल न चुका कर उसकी भरपाई करते हैं।

नेता यदि बड़ा हो और नेता के वंशज में दम हो तो उनकी मृत्यु के पश्चात उनके बंगले को स्मारक में परिवर्तित कर देने का पुनीत कार्य भी हो जाता है। इससे एक-दो सीढ़ी नीचे का भी नेता हो तो बेटा अमेरिका की शानदार नौकरी छोड़ कर राजनीति में आता है। वह पिता के बंगले में रहते हुए सांसद और मंत्री बन जाता है लेकिन सबसे बड़े प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने की इच्छा दमित हो जाती है। लोकतंत्र का पतझड़ आने पर जब सरकार बंगला खाली करवाना चाहती है तो पुत्र अधिकार पूर्वक मना कर देता है। सरकार बिजली और पानी का कनेक्शन कटवा देती है तो पुत्र नामी पिता के स्मारक की माँग रख देता है पर कृतघ्न सरकार पिता-पुत्र द्वारा लोकतंत्र की की गयी सेवा भूल जाती है और बंगला खाली करवा लिया जाता है।

देश में चुनाव क्षेत्र, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री का पद, पार्टी का अध्यक्ष पद और पार्टी सब विरासत में मिल जाते हैं तो यह समझ से परे है कि एक बंगले पर यह विरासत क्यों लागू नहीं हो सकता। वैसे बंगलों के मामले एक अच्छा काम हुआ है कि कुछ लोगों को बहाने बनाकर खाली-पीली ही बंगला दे दिया जाता है। बंगला देने के लिए सुरक्षा का बहाना बनाकर पहले एसपीजी सुरक्षा दी जाती है और सुरक्षा के अमला-फमला की सिफारिश से बंगला। लाभार्थी के लिए आम का आम भी हो जाता है और गुठलियों का दाम भी निकल जाता है। बंगले का उचित किराया रूपया में हो तो वह आना में भी नहीं, सीधे ढेबुआ में फिक्स हो जाता है। बस एक कमी रह जाती है। लाभार्थी के लिए ढेबुआ का भुगतान करना वैकल्पिक होना चाहिए।

वर्तमान सरकार बंगले की विरासत को स्थायी कर लोकतंत्र में स्वस्थ परम्परा स्थापित करने की जगह बदले की राजनीति कर रही है, कोरोना की विभीषिका से लोगों का ध्यान भटका रही है और सीमा पर चीन के साथ जारी तनातनी पर पर्दा डाल रही है। उसने ‘राम जी की बकरी राम जी का खेत’ के अन्तर्गत आवंटित प्रियंका वाड्रा का बंगला खाली करने का नोटिस सिर्फ इसलिए भेज दिया कि बंगले का ढेबुआ बराबर किराया नहीं चुकाया गया। षडयंत्र के तहत उनकी एसपीजी सुरक्षा पहले ही छीन ली गयी थी। नोटिस भेजते समय इस बात का भी ध्यान नहीं रखा गया कि बंगला आवंटित करते समय वह चाहे जो भी रही हों लेकिन आज वह एक उदीयमान और प्रखर काँग्रेस नेत्री हैं। यह बात अलग है कि उनका उदय होना और उनकी प्रखरता सिद्ध होना अभी शेष है।

काँग्रेस इस मुद्दे पर कभी शायर हो रही है तो कभी फायर। नेत्री के लिए 130 करोड़ लोगों के दिलों का घर खाली कराया जा रहा है। कोई शेरनी कहकर कुछ कमरों के बंगले को ठुकराने की बात कर रहा है। वास्तविकता कुछ और ही है। वर्तमान सरकार इस नेत्री पर जितनी कठोरता दिखा रही है, उससे थोड़ी भी कम कठोर काँग्रेस नहीं है। अखोर-बखोर तक को राज्यसभा भेजने वाली काँग्रेस यदि एक सीट प्रियंका जी  को दे देती तो उनके आज यूँ बेघर होने की नौबत नहीं आती। घर की सीट घर में रहती, सो अलग। पद देने का कोरम पूरा करते हुए उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश का पार्टी प्रभारी बना दिया गया जहाँ दशकों से पार्टी हाशिये पर है और दशकों तक यथास्थिति बनी रहने की आशंका है।

देश में आज एकांगी विमर्श चल रहा है। एंकर भयंकर की मानें तो मीडिया गोदी मीडिया बन चुका है। देश के लोग और मीडिया प्रियंका जी के पक्ष में आवाज बुलन्द करने की जगह उन्हीं से प्रश्न कर रहे हैं। सत्ता से सवाल पूछना हमेशा कठिन रहा है, आज विपक्ष से पूछना फैशनेबुल भी है और कंविनिएंट भी। पूछा जा रहा है कि प्रियंका जी को आलीशान बंगला किस हैसियत से मिला था। अरे भाई, वह एक पूर्व प्रधानमंत्री की परनतिनी, एक पूर्व प्रधानमंत्री की पोती और एक पूर्व प्रधानमंत्री की पुत्री हैं। सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों के बेटे, पोते, नाती, पोते, परपोते और परनाती के लिए बंगला देने की जगह सरकार प्रियंका जी से बंगला छीन रही है जिनकी नाक भी कभी देश की नाक रही उनकी दादी की नाक जैसी है। रही बात ढेबुआ बराबर शुल्क की तो क्या उससे कोरोना का डेफिसिट पूरा हो जाएगा या आर्थिक महाशक्ति चीन से टकराने को तैयार भारत इसी ढेबुआ के भरोसे बैठा है?

बहरहाल, प्रियंका जी ने न सिर्फ बंगले का किराया भर दिया है बल्कि उसे छोड़ने का निर्णय भी कर लिया है। परिवार के त्याग की पुरानी परम्परा इससे और उज्ज्वल हुई है। कभी उनकी माता जी ने प्रधानमंत्री पद त्याग कर प्रधानमंत्री पद पर एक प्रतिमा स्थापित कर दी थी। गलत मत समझिये, यहाँ प्रतिमा से अभिप्राय ईमानदारी और विद्वता की प्रतिमा डॉ. मननमोहन सिंह से है। पिछले वर्ष उनके भाई ने भी काँग्रेस अध्यक्ष पद छोड़कर कुछ ऐसा ही त्याग किया था। अब वह फिर अध्यक्ष बनने वाले हैं, एक साल का त्याग कुछ कम नहीं होता। छोटे मोटे त्याग तो उनके पति पिछले 5-6 साल से करते आ रहे हैं।

खबर है कि प्रियंका जी दिल्ली का बंगला छोड़कर लखनऊ में सेटल होंगी। वहाँ से वह उत्तर प्रदेश की राजनीति करेंगी। काँग्रेस के मुठ्ठी भर बचे समर्थक इसे ‘घीव से भी चिकन’ बता रहे हैं। लेखक प्रियंका जी को उनके उपक्रम के लिए शुभकामनाएँ प्रेषित करते हैं।

यह महज संयोग नहीं है कि चुनाव की दहलीज पर खड़े यूपी के पड़ोसी बिहार में प्ल्यूरल पार्टी की पुष्पम जी बिहार के 30 साल के तथाकथित लॉकडाउन को तोड़कर बिहार को खोलने की जद्दोजहद कर रही हैं। इतना ही नहीं ऐश्वर्या जी की चचेरी बहन करिश्मा जी का भी राजद में आगमन हो चुका है। हो सकता है कि देश की राजनीति एक बार फिर बिहार-यूपी से ही बदलने वाली हो और क्या पता कि इस बार यह शुभ कार्य महिला शक्ति ही कर गुजरे।

4 thoughts on “बकैती बंगले पर

  1. आपकी भाषा और लेखन अंदर तक आह्लादित कर देते है।
    आपको आभार🙏🌹

    1. बहुत बहुत धन्यवाद तिवारी जी।

  2. हमेशा की तरह शानदार लेख। आप आंचलिक शब्दों को जिस तरह से अपने लेख में जगह देते है, मजेदार और गुदगुदाने वाला अनुभव होता है। जय हो! 🙏

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