बाढ़ राहत की महिमा – मंडली
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बाढ़ राहत की महिमा

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जनसंख्या में ज्यामितीय वृद्धि और संसाधनों की अंकगणितीय वृद्धि के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए प्रकृति रौद्र रुप धारण करती है। माल्थस का यह सिद्धांत भले ही अतिशयोक्तिपूर्ण हो लेकिन प्रकृति कई बार अपने कोप से हमें अपनी शक्ति का अहसास अवश्य कराती है वरना एसी में बैठकर हम गर्मी को साधने, ब्लोअर लगाकर सर्दी मिटा देने की गलतफहमी पालने लगते हैं। भूकंप, बाढ़ और तूफान में मानव प्रजाति की बेबसी ही नहीं दिखती बल्कि प्रकृति को विजित बनाने का उसका भ्रम भी टूटता है।

सन 2000 में पूर्वी और पश्चिम चंपारण, गोपालगंज, सीवान, छपरा एवं अन्य कई जिले बाढ़ की चपेट में थे। इस बाढ़ से कुछ वैसे क्षेत्र भी प्रभावित थे जो आम तौर पर बाढ़ पीड़ित नहीं होते। हम आठ पहरिया चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज का कितना भी मजाक उड़ा लें लेकिन सत्य यह है कि हमारा समाज ही सनसनी प्रेमी है। बाढ़ की विभीषिका तक में भी हम सनसनी से परहेज नहीं रखते। ‘पानी कहाँ तक पहुँचा’ और ‘पानी की रफ्तार’ का सच्चा-झूठा अपडेट लगभग सबके पास था। ऐसा अपडेट देने वाले वही लोग थे जिनके यहाँ बाढ़ का पानी नहीं था। इन क्षेत्रों के लोग अचानक पर्यटन प्रेमी भी हो गए। ये लोग ‘बाढ़ देखने’ अगल-बगल के गाँवों में जाने लगे। पता नहीं कहाँ तक पहुँच पाते थे परन्तु लौटकर मिर्च मसाला युक्त आँखों देखा हाल सुनाकर सनसनी पैदा करने की कोशिश अवश्य करते थे।

उत्सव हो, विपत्ति हो या विभीषिका, अफवाह की द्रुत गति हमेशा एक समान ही होती है। बाढ़ नेपाल द्वारा छोड़े गए पानी के कारण था। पानी के साथ शायद कुछ सांप भी बहकर आ गए थे या अधिक पानी होने के कारण बिल से बाहर होकर यहाँ-वहाँ दिखने लगे थे। कई ज्ञानी लोगों को यह कहते हुए सुना गया; “नेपाल दु लाख फीट (दो लाख क्यूसिक नहीं) पानी आ दु लाख सांप छोड़ले बा*।

बाढ़ कुछ क्षेत्रों में भयावह थी। राष्ट्रीय राजमार्ग 31 मुहम्मदपुर से गोपालगंज तक तीन जगह टूट गया था। इन जगहों पर तेज प्रवाह की नहर बह रही थी। बाढ़ से अस्त व्यस्त हुए जन जीवन का भान स्थानीय प्रशासन और सरकार को था या कम से कम वे ऐसा दिखा रहे थे। स्थिति को संभालने के लिए सेना के जवान प्रखंड मुख्यालयों में आ गए थे। नौकाएं मँगा ली गयी थीं। पीडित क्षेत्रों में राहत के लिए कितनी नौकाएं गयीं, इसका कोई स्पष्ट आंकड़ा नहीं था। राहत सामग्री का वितरण आरम्भ हो गया था। परोपकारी नेतानुमा लोग नौका पर पीडित क्षेत्रों में ‘चिउरा-गुड़’ बाँटने का दावा कर रहे थे जिसकी पुष्टि करना कठिन था।

सरकारी राहत में प्रति परिवार 250 रुपया और 25 किलो गेहूँ बाँटा जा रहा था। प्रखंड मुख्यालय बसंतपुर से सटे गाँवों में संयुक्त परिवार एकल परिवारों में बँटने लगे ताकि 250 रुपये और 25 किलो गेहूँ की अनेक किश्तें मिल सकें। भरपूर राहत उठाया इन गाँवों ने जबकि इनमे से अधिकांश गाँव बाढ़ से आहत नहीं थे। बाढ़ से बचे इन गाँवों में इक्का-दुक्का ही लोग थे जिन्होने बाढ़ राहत लेने से मना किया। लेकिन इन लोगों का पुण्य भी काम नहीं आया और एक-दो दिन में प्राकृतिक न्याय के अन्तर्गत इन गाँवों में भी बाढ़ का पानी आ गया। प्रशासन साधुवाद का पात्र बना जिसने बाढ़ आने से पहले ही बाढ़ राहत मुहैया करा दी थी।

प्रखंड मुख्यालय बसंतपुर से 5-6 किलोमीटर दूर स्थित राजापुर बाढ़ के अति पीड़ित गाँवों में से एक था। गाँव का संपर्क चारों तरफ से टूट चुका था। यहाँ कोई सरकारी या गैर-सरकारी सहायता नहीं पहुँची थी। गाँव के लोगों को पता चला कि प्रखंड मुख्यालय में राहत सामग्री बँट रही है। गाँव से 150-200 लोगों का जत्था बसंतपुर की तरफ निकला। सबके हाथों में लाठी थी। प्रखंड प्रशासन को यह खबर मिली तो अनिष्ट की आशंका से हड़कंप मच गया। जत्थे के पहुँचने से पहले तमाशबीन प्रखंड मुख्यालय पहुँच गए। स्थिति से निबटने के लिए प्रशासन ने कमर कस ली। पुलिस बल की मौजूदगी में लाउडस्पीकर पर लगातार घोषणा की जा रही थी; “राजापुर से आए लोगों को 250 की जगह 500 रुपये दिए जाएंगे और गेहूँ 25 किलो नहीं बल्कि उतना, जितना वे लेकर जा सकते हैं। कृपया शांति बनाए रखें और राहत सामग्री लें।“

जत्था प्रखंड मुख्यालय पहुँचा और अपनी बाढ़ राहत लेकर अपने गाँव वापस जाने लगा। शांति व्यवस्था पूरी तरह कायम रही। नेतानुमा लोग श्रेय लेने के लिए जत्थे के साथ चलने लगे। एक खादीधारी बोले; “हम चार दिन से आपके लिए लगे थे पर हमारे संघर्ष से कुछ नहीं होता, यदि आपने अपनी लाठी की ताकत नहीं दिखायी होती।“ ऐसी दो-चार बातें सुनने के बाद जत्थे का एक ग्रामीण बोला; “हमनी पानी थाहे खातिर लाठी लेके आइल रनी हs, केहु के कपार फोड़े ला ना**।“ यह सुनकर खादीधारी प्राणियों का प्रलाप एंटी-रोमांटिक नोट पर समाप्त हो गया।“

ऐसा सुना था कि घी निकालने के लिए उंगली टेढ़ी करनी पड़ती है पर ऐसा पहली बार होता दिखा कि घी के बर्तन ने भ्रम में सीधी उंगली को ही टेढ़ी समझ लिया और घी निकल गया।

*नेपाल दु लाख फीट (दो लाख क्यूसिक नहीं) पानी आ दु लाख सांप छोड़ले बा: नेपाल ने दो लाख फीट (दो लाख क्यूसिक नहीं) पानी छोड़ा है और दो लाख सांप

**हमनी पानी थाहे खातिर लाठी लेके आइल रनी हs, केहु के कपार फोड़े ला ना: हमलोग पानी थाहने के लिए लाठी लेकर आए थे, किसी का सिर फोड़ने के लिए नहीं

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