मंडली

सौहार्दपूर्ण और समावेशी न्याय

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9 नवंबर की सुबह मुझे और मेरे मित्र को सड़क मार्ग से बिहार से दिल्ली आना था। 8 नवम्बर की शाम यह समाचार आया कि कल ही अयोध्या मामले पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आएगा। निर्णय के बाद किसी अप्रिय स्थिति पर मन में आशंकाएं उठने लगी और यात्रा एक दिन के लिए स्थगित करनी पड़ी। एक आम आस्तिक और न्याय में विश्वास करने वाले हिन्दू की तरह मैं भी 8 नवंबर की सुबह टीवी के सामने बैठ गया। घर पर होता हूँ तो माँ अक्सर साथ होती है। टीवी की हलचल से उसे पता चल गया कि क्या होने वाला है और वह राम-राम गोहराने लगी।

साढ़े दस बज गये और निर्णय के महत्वपूर्ण विन्दू आम लोगों तक पहुँचने की उल्टी गिनती शुरु हो गयी। पहला बेक्रिंग हेडलाइन आया – शिया बोर्ड की याचिका खारिज। धड़कनें बढ़ीं, फिर और तेज हुईं जब टीवी पर यह हेडलाइन चलने लगा – निर्मोही अखाड़े की याचिका भी खारिज। अन्य विवरणों के साथ निर्णय का सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाग हमारे समक्ष आया। माननीय सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने रामलला को न सिर्फ कानूनी सत्व (entity) माना बल्कि रामलला विराजमान को विवादित भूमि का स्वामित्व भी दिया। इस सर्वोच्च, सर्वसम्मत, समावेशी, सौहार्दपूर्ण, सर्वथा स्वागतयोग्य, सब पर बाध्यकारी, महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक निर्णय से न्याय में हुई दशकों की देरी की भरपाई सौहार्द सहित न्याय की स्थापना से हुई। यह विश्व समुदाय के समक्ष भारतीय न्याय व्यवस्था की गुणवत्ता, तटस्थता और स्वतंत्रता का एक और उदाहरण है। सर्वोच्च न्यायालय की इस पीठ में न्यायधीश पाँच थे, पंच थे और बड़ी सहजता से कहा जा सकता है कि पंच परमेश्वर थे। इतिहास के रजत पृष्ठ पर इनका नाम प्रमुखता से स्वर्णकारों में अंकित होगा।

अयोध्या मामले में आस्था का जुड़ाव का एक उदाहरण उपर मेरी माँ के टीवी के सामने बैठकर राम-राम गोहराने में देखा जा सकता है। राम और कृष्ण के इस राष्ट्र में ऐसी आस्था के अनेकों रुप अन्य जगहों पर भी दिखे होंगे। अन्य मामलों की तरह न्यायालय का यह निर्णय भी साक्ष्यों के आधार पर ही हुआ लेकिन न्याय के क्रम में यह बहुजन आस्था भी संतृप्त हुई, भले ही कोई इसे महज संयोग मान ले। दूसरी ओर दूसरे पक्ष से जुड़ी आस्था का सम्मान भी सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कानून सम्मत अधिकार एवं विवेक से किया और सरकार से इस पक्ष को अयोध्या में उचित स्थान पर पाँच एकड़ जमीन देने को कहा। साथ ही न्यायलय ने राम मंदिर के निर्माण के लिए बनायी जाने वाले ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़े को भी शामिल करने की बात कही है। इस दृष्टि से यह निर्णय संतुलित, सौहार्दपूर्ण और समावेशी दिखता है। सर्वोच्च न्यायलय का यह निर्णय समापक और सब पर बाध्यकारी है। इसकी वैधानिकता को और मजबूती इस तथ्य से मिलती है कि पाँच न्यायधीशों की पीठ का यह निर्णय सर्वसम्मत था।

न्यायालय के निर्णय का चतुर्दिक स्वागत हुआ है। कुछ अंसंतोष के स्वर भी फूटे। ऐसे स्वरों का भी स्वागत है यदि वे संवैधानिक परिधि में हों और परिधि यह है कि यदि कोई असंतोष है तो न्यायालय की बिना आलोचना किए संबद्ध पक्ष न्यायिक पीठ के समक्ष पुर्नविचार की याचिका दायर करे। सुन्नी वक्फ बोर्ड संबद्ध पक्ष है जिसने ऐसी पुर्नविचार याचिका नहीं डालने का फैसला किया है। ऐसी स्थिति में वे सारे प्रलाप महत्वहीन हो जाते हैं जो तमाम लेखों से मीडिया के विभिन्न हिस्सों में आ रहे हैं या जो विभिन्न व्यक्तियों द्वारा टीवी पैनल चर्चाओं में उठाए जा रहे हैं। बैरिस्टर ओवैसी भी अपवाद नहीं हैं।

न्यायालय के निर्णय के बाद आम जन में कानून व्यवस्था में को लेकर आशंका थी। यह आशंका भी निर्मूल सिद्ध हुई और कहीं से किसी अप्रिय घटना का समाचार नहीं आया। 9 नवंबर को मैंने सीवान से दिल्ली तक लगभग हजार किलोमीटर की सड़क यात्रा में कहीं कोई तनाव नहीं देखा। केन्द्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार, अन्य राज्य सरकारें और उनके प्रशासनिक तंत्र साधुवाद के पात्र हैं। अलबत्ता थोड़ा-बहुत कृत्रिम तनाव मीडिया और सोशल मीडिया पर अवश्य दिखा।

पिछले दो-तीन दशकों में वार्ता से अयोध्या विवाद सुलझाने के अनेक प्रयास हुए थे। चन्द्रेशखर सरकार, नरसिंह राव सरकार, अटल सरकार के अलावा कुछ गैर-सरकारी व्यक्तियों ने भी विवाद सुलझाने की पहल की थी किन्तु ये सारे प्रयास असफल रहे। यह स्थापित हो चुका था और सब पक्षों में मान्य भी था कि सर्वोच्च न्यायालय ही इसे सुलझा सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से राष्ट्रीय महत्व के इस पुराने विवाद की निबटारा ही नहीं हुआ बल्कि अयोध्या में जन भावना के अनुकूल भव्य और दिव्य राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो गया है। न्यायलय ने राम मंदिर ट्रस्ट की जिम्मेदारी सरकार को दी है। आशा है कि सरकार इसका निर्वहन उचित तरीके से करेगी। राम मंदिर के निर्माण पर श्रेय लेने की बातें भी होंगी। प्रभु श्रीराम के मंदिर का सबसे बड़ा श्रेय स्वयं भगवान का ही होगा क्योंकि सब कुछ उनकी इच्छा और उनके मनोनुकूल समय पर ही होता है। राजनीतिक रुप से इसका सीधा लाभ भाजपा को ही मिलेगा। वैसे विरोधी यह कहेंगे कि न्यायालय के निर्णय से मंदिर निर्माण हो रहा है, इसमें भाजपा को श्रेय क्यों मिले। इस तर्क में कमजोरी यह है कि मामला न्यायलय के समक्ष लंबित था तो भाजपा को राम मंदिर निर्माण के लिए ताने क्यों दिए जा रहे थे। भाजपा या उससे जुड़े संगठनों को श्रेय इस बात के लिए जाता है कि उन्होंने जनमानस में राम मंदिर के लिए एक भावना जागृत की, आस्था तो पहले से ही थी। जनमानस की इस जागृति ने एक आन्दोलन का रुप लिया, न्यायिक प्रक्रिया से इस आन्दोलन का फलितार्थ हमारे समक्ष है। साथ ही एक तथ्य यह भी है कि न्यायालय के निर्णय में यदि हिन्दुओं के लिए निराशा के तत्व होते तो भाजपा के राजनीतिक कौशल की कठिन परीक्षा होती।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपना काम सराहनीय ढ़ंग से कर दिया है। अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह शांति और सौहार्द के बीच यह सुनिश्चित करे कि निर्णय की नियति वह हो जो उसकी नीयत है।

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