मंडली

अप्रत्याशित प्रबोधक

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अगस्त की बारिश का जादू नैराश्य से भरे मन को भी प्रफुल्लित कर देने की क्षमता रखता है। शहर के राजमार्गों के दोनों ओर लगे वृक्षों के पत्ते बारिश में नहाकर नयी हरे रंग की साड़ी पहनी नववधु की भाँति पल्लवित होते हैं। ऊँची और बादलों से बातें करतीं इमारतों और सड़कों की रौनक ही बदल जाती है। चार माह का ताप सह कर पानी का आनंद लेते ये निर्जीव पदार्थ भी जीवित से हो उठते हैं। ऐसे खुशनुमा माहौल में भी बाइक से घर की ओर जा रहे प्रदीप का मन शांत नहीं था। आज फिर उसे एक और असफलता का स्वाद चखना पड़ा था। दो महीनों में आज पाँचवीं बार उसने रिजेक्शन का मुँह देखा था। अब उसका धैर्य और आत्मविश्वास दोनों जवाब दिए जा रहे थे।

सड़क से सरसराते हुए जा रही बाइक पर उसके मस्तिष्क में विचारों का प्रवाह भी तेजी से हो रहा था। घर पहुँचते ही पापा पूछेंगे कि क्लाइंट के साथ मीटिंग कैसी रही तब वो क्या जवाब देगा? प्रदीप प्रतिभावान तो था ही पर साथ साथ उसे इंडस्ट्री में छह वर्षों का अनुभव भी था। पिछले चार माह में कोविड महामारी के चलते वह अपने सभी प्रोजेक्ट्स से हाथ धो बैठा था। लॉकडाउन खुलने के बाद उसे आशा थी कि वह किसी तरह से काम पा ही लेगा। अगर ऐसा ही और दो माह तक चला तो घर चलाने के लिए उसे कर्ज लेने की स्थिति आ जाएगी। उसका बैंक बैलेंस अपने निम्नतम स्तर पर था। चिंता के कारण रात भर वह जागता रहता और अवसाद की वजह से  कभी कभी उसे जीवन समाप्त करने के विचार भी आने लगे थे। अभी भी उसके दिमाग में आत्महत्या के भयावह विचार मँडरा रहे थे।

बारिश बढ़ रही थी। इसलिए प्रदीप ने सड़क के किनारे बाइक लगाई और बारिश रुकने का इंतजार करने लगा। सड़क पर वाहन व्यवहार ना के बराबर था।  इक्का दुक्का राहगीर ही दिख रहे थे। तभी प्रदीप ने अपने पसंदीदा प्याज पकौड़े की सुगंध महसूस की।  प्याज के पकौड़े वैसे ही प्रदीप की कमजोरी थे और यदि ये बारिश के मौसम में मिलें तो सोने पे सुहागा। कुछ क्षणों के लिए वह अपनी सारी चिंताएँ भूल गया। उसकी आँखें पकौड़ों के ठेले को ढूँढने लगीं। कुछ ही दूरी पर लगभग पचास साल का आदमी गर्मागर्म पकौड़े तल रहा था।

बारिश का जोर बढ़ता ही जा रहा था। इसके रुकने के कोई आसार नहीं दिख रहे थे।  प्रदीप के सामने न्यूज़ पेपर में लपेटे हुए पकौड़े थे, लेकिन उसका मन अब भी उद्विग्न था। उसके सामने अंधकारमय भविष्य की कल्पनाएँ झिलमिला रहीं थीं। उसने इन विषादमय विचारों  से ध्यान हटाने के लिए न्यूज़ पेपर पर ध्यान केंद्रित किया। वहाँ किसी ऐतिहासिक घटना का लेख छपा हुआ था। उसने पढ़ना शुरू किया।

“मेजर चार्ल्स मन्ट, ब्रिटिश काल के इस प्रतिभाशाली वास्तुविद का नाम शायद ही किसी ने सुना/ पढ़ा हो। इंटरनेट और किताबों में भी इनका किस्सा नहीं लिखा गया। इनकी तस्वीर भी दुर्लभ है। इतिहास लिखने वालों ने इन्हें जरूर भुला दिया पर इनके द्वारा निर्मित इमारतें मेजर की प्रतिभा का बखान करते हुए आज भी खड़ी हैं।

ब्रिटिश वास्तुविद्या में शिक्षा प्राप्त करने वाले मेजर मन्ट गोथिक शैली के भवन निर्माण में निष्णात माने जाते थे लेकिन भारतीय स्थापत्य कला के आकर्षण से वह अछूते ना रह सके। गोथिक शैली और भारतीय स्थापत्यों के मिश्रण से बनी INDO-SARACENIC शैली की इमारतों में इनकी महारत ने इन्हें भारतीय महाराजाओं का प्रिय वास्तुविद बना दिया।”

प्रदीप को यह लेख रोचक लगा। फटाफट से उसने पकौड़े को न्याय दिया और आगे का लेख पढ़ने के लिए प्रशस्त हुआ।

“शुरूआती दौर में सूरत और काठियावाड़ में स्कूल और न्यायालय जैसे भवनों का गोथिक शैली में निर्माण करने के बाद इन्होंने INDO-SARACENIC शैली को ही अपना लक्ष्य बनाया। अजमेर की मेयो कॉलेज और ओड़िशा में चर्च जैसे स्थापत्यों का निर्माण करते हुए इन्होंने बिहार का रूख किया। पटना के मेडिकल कॉलेज के साथ साथ कूच बिहार और दरभंगा में भी मेजर मन्ट ने अपनी बेजोड़ वास्तु कला का प्रदर्शन किया। उन्होंने राजमहलों के अलावा चर्च और कॉलेजों का वास्तु भी रचा। दरभंगा का आनन्दबाग पैलेस और पटना का दरभंगा हाउस भी इन्हीं की देन है।

कोल्हापुर के छत्रपति महाराज के लिए भी इन्होंने अपने वास्तुकला का जादू बिखेरा। इसके पश्चात इन्हें अपने जीवन का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट मिला – वडोदरा का ‘लक्ष्मी विलास पैलेस’!  डिजाइन के हिसाब से यह महल ब्रिटिश रानी के बकिंघम पैलेस से चार गुना ज्यादा बड़ा और अतिशय कलात्मक होने वाला था। लक्ष्मी विलास पैलेस यूरोपीय, इस्लामी के साथ साथ राजपूत, चौलुक्य और मराठा जैसी अनेक शैलियों के मिश्रण से तैयार किया जाना था। विविध प्रकार की शैलियों से इतने बड़े भवन का निर्माण करना मेजर मन्ट जैसे सिद्धहस्त वास्तुविद के लिए भी बड़ी चुनौती से कम नहीं था।

लक्ष्मी विलास पैलेस 700 एकड़ परिसर में फैलीं अनेक इमारतों का समूह है। इस पैलेस के दरबार हॉल को वेनेशियन टाइल और बेल्जियम ग्लास से जड़ा गया है। महल में सभी आधुनिक सुविधाओं के बावजूद भी इसमें भारतीयता झलकती है। फलिचि और राजा रवि वर्मा जैसे कलाकारों की कृतियों से इसे सजाया गया है।

इस महल की सभी खूबियों के विवरण के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं पर संक्षेप में कहा जाए तो यह महल बन कर तैयार हो जाने के बाद ‘न भूतो न भविष्यति’ को साकार कर सकता था। लेकिन महल का निर्माण कार्य शुरू करने के कुछ ही समय बाद मेजर चार्ल्स मन्ट ने पाया कि डिजाइन में कुछ अक्षम्य गलती हुई है। लक्ष्मी विलास पैलेस की नींव रखने में मेजर का गणित गड़बड़ा गया है। यह भव्य स्थापत्य निर्माण के कुछ ही महीनों के भीतर ढह जाएगा।”

एक ही साँस में प्रदीप ने यह सब पढ़ लिया। आगे का विवरण जानने की उसकी आतुरता बढ़ती ही जा रही थी। उसने एक लंबी साँस ली और आगे पढ़ना जारी रखा।

“मेजर मन्ट बारंबार डिजाइन और कैल्कुलेशन जाँचते रहे। हर बार उन्होने पाया कि उनसे भयंकर चूक हो गई है। इतना बड़ा महल इस कमजोर नींव पर टिक नहीं पाएगा। यदि यह महल ज़मींदोज़ हो गया तो उनकी ख्याति पर हमेशा के लिए दाग लग जाएगा। मेजर मन्ट ने अन्य निष्णातों से सलाह लेनी चाही पर मेजर की प्रतिभा पर किसी को संदेह नहीं था। वडोदरा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ को अपने वास्तुविद पर पूरा भरोसा था। महाराजा चाहते थे कि मेजर जल्द से जल्द महल निर्माण कार्य पूरा करें।

लोगों की अपेक्षाओं के बोझ तले दबे मेजर अब किसी से सलाह मशविरा भी नहीं कर सकते थे। वह मन ही मन में घुटन महसूस करने लगे। वह जितना ज्यादा सोचते उतना ही ज्यादा उन्हें यकीन होता जा रहा था कि यह स्थापत्य अल्पायु होने वाला है। अब उनके पास बस एक ही रास्ता बचा था। अपेक्षाओं के बोझ तले दबे अवसाद से घिरे मेजर ने अंतिम निर्णय लिया। लक्ष्मी विलास पैलेस का निर्माण अधूरा ही छोड़ कर उन्होंने आत्महत्या कर ली।

मेजर की मृत्यु के बाद निर्माण कार्य एक अन्य आर्किटेक्ट रॉबर्ट चिशोलम को सौंपा गया। उन्होंने निर्माण कार्य पूरा किया। आज 130 वर्षों बाद भी भव्यातिभव्य लक्ष्मी विलास पैलेस मेजर मन्ट के कौशल की गवाही देते हुए सीना ताने खड़ा है।”

बारिश रुक चुकी थी और बादल भी छँट गए थे। अनायास ही न्यूज़ पेपर में पढ़ा गया लेख प्रदीप के खिन्न मन को नई चेतना प्रदान कर गया। उसके मन से विषादमय विचार जा चुके थे। अब उसने कल से कुछ नया काम ढूँढने का प्रयास करने के लिए कमर कस ली थी। उसने सोच लिया था कि अब किसी भी परिस्थिति में वह हार नहीं मानेगा और दूसरा मेजर मन्ट तो कदापि नहीं बनेगा। उसने निश्चय कर लिया था कि वह अपने स्वप्नों के महल को अपनी आँखों के सामने साकार होते हुए देखेगा।

लेखक पौराणिक और ऐतिहासिक कथा संदर्भों के पार्श्व में सामयिक और दैनिक जीवन की समस्याओं का समाधान ढूँढने की कोशिश करती कहानियाँ लिखते हैं। उनके कुछ वृत्तांत उनकी अनवरत चलने वाली यात्राओं के भाग हैं। इसके अलावा उनकी रुचि लघुकथा, भारतीय मंदिर स्थापत्य और ललित कला से संबद्ध लेखन में भी है। उनकी शब्दावली में तत्सम शब्दों के अतिरिक्त गुजराती और मराठी का पुट भी होता है। लेखक पेशे से एक फ्रीलांस आइटी कंसलटेंट और डेटाबेस आर्किटेक्ट हैं।

4 thoughts on “अप्रत्याशित प्रबोधक

  1. प्रेरणा से भरपूर बेहतरीन कहानी है आप की।👌👌 इस कोरोना पीरियड में बहुत लोग नौकरी के अभाव में तनावग्रस्त है, उनमें ये नवजीवन का संचार करेगा और आमलोगों को आत्महत्या जैसे ख़याल से दूर भगाएगा।

  2. सही मायने में यह कहानी अपने शीर्षक को सार्थक करती है और आशंका, अवसाद को दूर कर मन का प्रबोधन करती है।
    मोरे मन प्रबोध जेहि होई। 🙏

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