मंडली

अप्रतिम पंचम दा

शेयर करें

कहा जाता है कि किसी भी शोर को आवाज़ बनाते हुए उसे धुन में बदल देने वाले जादूगर थे पंचम दा। क्या कभी आर डी बर्मन, जिन्हें हम प्यार से पंचम दा कहते हैं, जैसे संगीतकार पर कभी भी ऐसा कुछ लिखा जा सकता है जिसे लिखने के बाद आप कहें कि बस अब इसके बाद कुछ नहीं? जाने कितने आलोचकों, समीक्षकों, प्रशंसकों और साथी संगीतकारों ने ऐसी कोशिश की पर पंचम को पूरा समझना उतना ही मुश्किल है जितना डॉन को पकड़ना।

27 जून, 1939 को पैदा हुए पंचम दा आज 81 वर्ष के होते। टेक्नोलॉजी की इस नयी दुनिया में वह क्या गुल खिला रहे होते, हम अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते। मेरा ये मानना इसलिए है कि उस ज़माने में जब इतनी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थी तब वो ऐसा काम कर के चले गए कि आज के संगीतकार अपना माथा पकड़ा कर रह जाते हैं कि ये किया कैसे होगा?

हम सभी संगीत प्रेमियों को, भले ही वो पंचम दा फैन हो या न हो (वैसे मैंने आज तक किसी से नहीं सुना कि उसे पंचम के बनाये गीत पसंद नहीं थे) आज पंचम दा की कई ऐसी अद्भुत संगीत रचनाओ के बारे में पता है जो उनके अलावा और कोई सोच नहीं सकता था।

आज लगभग सभी जानते हैं कि “शोले” के गीत “महबूबा” में बीयर की बोतलों से आवाज़ निकाली गयी थी और फिल्म “यादों की बारात” से “चुरा लिया है” गीत में गिलास/कप पर चम्मच टकरा कर आवाज़ निकाली गयी थी।

पर क्या आपको पता है कि अपने रिदम अरेंजर मारुती राव साहब की पीठ को ही एक बार पंचम ने अपनी नयी आवाज़ बना लिया था। सुनिए 3.07 मिनट पर इस गीत में …

https://www.youtube.com/watch?v=qkp6wvkgUS8

बात यहीं तक रहती तो ठीक था पर वो तो पंचम थे जिन्होंने साँसों को भी स्वर दे डाले थे। “दुनिया में लोगों को” पहला ऐसा गीत था जिसमे उन्होंने ये कमाल दिखाया था।

https://twitter.com/Shrimaan/status/1056401287833640961?s=20

अब जब साँसों की बात चली ही है तो फिर गले की बात भी कर ली जाए, जहाँ पर पंचम ने गार्गल की आवाज़ को एक ऐसा मुकाम दिया था कि सालों लोग अंदाज़ा ही लगते रहे कि वो आवाज़ आखिर थी क्या?

https://twitter.com/Shrimaan/status/1052042985083269121?s=20

एक समय जब उनके संगीतकर और उनके वाद्ययंत्र उनको नहीं मिले तो उन्होंने सिर्फ सैंड पेपर और बांस की खपच्चियों को ही इस्तेमाल कर डाला था।

वो ट्रेन की आवाज़ जो आप सुन रहे हैं वो सैंड पेपर से निकाली गयी आवाज़ थी।

https://www.youtube.com/watch?v=5nVRo0tSoAc

सेमी क्लासिकल रचना में गिटार को इस्तेमाल करने का हौसला भी पंचम दा के पास ही था जहाँ उन्होंने गिटार को संतूर के साथ जोड़ डाला था। ये कारनामा उन्होंने रैना बीती जाए और  चिंगारी जो भड़के दोनो में दोहराया था।

 https://www.youtube.com/watch?v=RRk9pG5Upe4

फ्लेंजिंग इफ़ेक्ट के करता धर्ता भी पंचम दा ही थे जिन्होंने उसे बखूबी कई फिल्मो में इस्तेमाल किया। “धन्नो की आँखों में” उसी इफ़ेक्ट से शुरू होता है और फिर आप इस आवाज़ को कई और फिल्मो के गीतों में भी पहचान सकते हैं जैसे हमें तुसे प्यार कितना, वन टू च च चा, तुम क्या जानो आदि।

https://www.youtube.com/watch?v=iwuk-C39H6k

क्या आपको पता है कि पड़ोसन फिल्म का सुपर हिट गीत एक चतुर नार तीन गीतों को मिला कर बनाया गया है?

एक चतुर नार – फिल्म झूला 1941

बन चले राम रघुराई – भजन 1939

चंदा जा रे – मनमौजी 1961

बर्निंग ट्रेन की कहानी सुनने के बाद जब टाइटल ट्रेक बनाया जा रहा था तो ये पंचम दा का ही दिमाग था कि बाद में उन्होंने उस ट्रेक में वुड ब्लाक की आवाज़ को भी जोड़ दिया था। जानते हैं क्यों ?

टाइम बम की टिक टिक के “फील” के लिए

https://www.youtube.com/watch?v=BBO1lMrrxg0

“अमर प्रेम” एक ऐसा अल्बम था जिसके आने के बाद लोगों को विश्वास होना मुश्किल हो गया था कि पंचम दा ऐसा भी कुछ कर सकते हैं। इन्ही हैरान परेशान लोगों में एक थे मदन मोहन जी जिन्होंने यह मानने से इनकार कर दिया कि पंचम ने अमर प्रेम के गीतों की रचना की है। काफी लोगों का मानना था कि इन गीतों की रचना उनके पिता जी यानि बड़े बर्मन साहब ने की है।

मदन मोहन वाले समय से लेकर अमित त्रिवेदी के समय तक पंचम के दीवाने आपको हर जगह मिल जायेंगे। जैसा मैंने कहा था कि लिखने बैठा जाए तो हर गीत की एक कहानी निकल आयेगी। उन्ही आवाज़ों के कुछ किस्से आप ट्विटर पर भी देख सकते हैं। लिंक नीचे दिया गया है।

https://twitter.com/Shrimaan/status/946606093873987586?s=20

फिलहाल म्यूजिकल लेजेन्ड वन एंड ओनली आर डी बर्मन को नमन करते हुए, उनकी सोच को सलाम  करते हुए आपसे आज्ञा लेता हूँ और सुनवाता हूँ लता जी का एक गीत जिसमे उन्होंने एक ही गीत को दो बार अलग-अलग अंदाज़ में पेश किया था। फिल्म थी जुर्माना, गीत था, सावन के झूले पड़े हैं। राखी का चरित्र शुरुआत में शौकिया गायक का होता है जो बाद में सीखने के बाद स्टेज पर गाती है। इस बदलाव को पंचम दा ने लता दी के सहारे जिस तरह से गीत की गायकी में उतारा था वो शायद आज से पहले आपने भी महसूस न किया हो पर आज आप करेंगे।

https://www.youtube.com/watch?v=XmNfoDI11NA&t=202s

नौसखिया और सीखे हुए गायक के अंतर को उन्होंने फिल्म कारवां में आशा जी के द्वारा भी दिखाया था। याद है आपको वो गीत ?

ढूँढ कर सुन लीजियेगा। और उसकी कहानी ? वो किसी और दिन ..

लेखक मुख्य रूप से भावनात्मक कहानियाँ और मार्मिक संस्मरण लिखते हैं। उनकी रचनाएँ आम बोलचाल की भाषा में होती हैं और उनमें बुंदेलखंड की आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक का मानना है कि उनका लेखन स्वयं की उनकी तलाश की यात्रा है। लेखक ‘मंडली.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी रचनाएँ 'ऑप इंडिया' में भी प्रकाशित होती रही हैं। उनके प्रकाशित उपन्यास का नाम 'रूही - एक पहेली' है। उनका एक अन्य उपन्यास 'मैं मुन्ना हूँ' शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है। लेखक एक फार्मा कम्पनी में कार्यरत हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *