अपनी पीठ थपथपाने के नुख्खे – मंडली
मंडली

अपनी पीठ थपथपाने के नुख्खे

शेयर करें

लॉक -डाउन  के दौरान निठ्ठलापन क्या-क्या नहीं कराता। अपनी पीठ थपथपाने की चेष्टा की लेकिन यह असंभव सा कार्य लगा। वर्तमान परिस्थिति में दूसरे की पीठ थपथपाना तो छोड़िये उस पर हाथ रखना भी अपराध हो गया हैं, स्वयं के प्रति और उस व्यक्ति के प्रति भी। प्रगाढ़ चिंतन से ज्ञात हुआ अपनी पीठ थपथपाना संभव हैं। हम जैसे निज को व्यंगकार कहने वाले इस विधि को समझ पाने में असमर्थ हैं। हमारी छोटी बुद्धि को दूसरों को  खुजाने  या यदा -कदा निज को खुजाने तक ही सीमित हैं। क्या पता कोई खुजाने की व्यग्रता के आवेश में कुछ भला कर डाले।

अपनी पीठ थपथपाने के  प्रयास  की प्रेरणा मुझे राजनीतिक दल के समर्थकों और प्रवक्ताओं से मिली। ट्रेन के डिब्बों में वायरस पीड़ित को संगरोधित करने के व्यवस्था के लिए  अपनी पीठ थपथपाना, फिर उसमे दी गई सुविधाओं के जंग लगने पर अस्पतालों और स्वास्थ व्यवस्था की पीठ थपथपाना, कोई कैसे सीख सकता है भला। प्रवासी मजदूरों को कार्य स्थल पर तो आपने को कोरोना-वारियर कह कर पीठ थपथपा लिया। उनके लिए आधी-अधूरी यात्रा की व्यवस्था करा ली तो फिर वाह, वाह …। यह सब नहीं भी कर पाते तो ऐसा नहीं करने को मास्टर स्ट्रोक कह कर पीठ थपथपा ही लेते। इस प्रवृति से प्रेरणा ली जानी चाहिए।

ताज़ा ये सुनने में आ रहा हैं कि पुनः प्रवासियों को जाने की अनुमति नहीं मिल रही।  प्रजातंत्र में तंत्र ज्यादा महत्वपूर्ण हैं –  बहत्तर  वर्ष  में  अगर ये अगर प्रजा ने नहीं सीखा तो उसके और भेड़-बकरियों के बीच समानता एक संयोग मात्रा हैं। अपनी पीठ थपथपाने के लिए ‘मिशन  वन्दे – भारत’ अवश्य करेंगे।  न जाने कितने दिनों तक विश्व का सबसे बड़ा राहत प्रयास हमारी पीठ की हल्की मालिश करता रहेगा।

एक अन्य पक्ष को तो अपनी पीठ भी नहीं दिखती।  उन पक्ष में सब के सब एक माँ-पुत्र द्वय की पीठ थपथपाने में व्यस्त रहते हैं।  उनकी दूरदर्शिता और दानवीरता के कितने कथा बाँचे जाते हैं। एक ने यह कह डाला कि वर्तमान सरकार एक पखवाड़े के बाद हमारे निवर्तमान अध्यक्ष का कहा मानती हैं। प्रारंभ में कथा की मूल विषय-वस्तु समझ नहीं पाती हैं।

दिल्ली के बारे में इतना कुछ लिखा जा चुका है कि अब नयी अनुभूति नहीं आती । हालाँकि दिल्ली और उसके मालिक और उनके चेले आश्चर्य में डालने की  क्षमता रखते हैं।  महात्मा बुद्ध पर शायरी इसी का उदहारण हैं, यदि कोई  ७० लाख को राशन -पानी पहुँचाने से अचम्भित न हुआ था तो।

प्रजातंत्र और गणतंत्र में अंतर हैं। गण भेड़-बकरियों की तरह सीधी चाल नहीं चलता।  वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता , निजत्व तथा सरकारी  नीतियों और नियमों  का चीड़ -फाड़ करता हैं। फ्रेंच रिवोल्युशन के एक वर्ग की तरह कॉफ़ी हाउस में वाद -विवाद करता हैं। अगर गण सहायतार्थ निकलता हैं तो उसका मोबाइल उसका सबसे बड़ा अस्त्र हैं। चित्र छापते समय उसे भी अपनी पीठ थपथपाने की अपेक्षा होती हैं। निजत्व का बोध तो प्रजा का बनता।

पीठ थपथपाने  और भी नुस्खे हैं – जैसे  मैं चंगा वो  नंगा – अर्थात मैं मस्त वो पस्त, मैं खीरा चोर वो हीरा चोर – अर्थात  उसकी भूल  मेरे से वृहद् हैं। मैं और भी नुस्खों पर शोध कर रहा हूँ पर घर वाले सहयोग नहीं कर रहे और मुझ पर ‘बिजी विदाउट बिजनेस’ की फब्तियाँ कसते रहते हैं।

लेखक – अतुल कुमार (@Khakshar)

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *