40 साल पहले का नया-नवेला और अलबेला मेडले – मंडली
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40 साल पहले का नया-नवेला और अलबेला मेडले

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ये उन दिनों की बात है जब ‘हम किसी से कम नहीं’ की शूटिंग चल रही थी। एक गाने की शूटिंग को लेकर मामला अटका हुआ था। गीत फिल्माया जाने वाला था ऋषि कपूर के ऊपर जो उनकी नासिर हुसैन के साथ पहली फिल्म थी। बात अटक गयी थी ऋषि साहब की ड्रेस के ऊपर जो तय नहीं हो पा रही थी। आखिरकार ऋषि साहब ने ही पोशाक को नासिर साहब को सुझाया था और साथ ही डर भी जताया था कि यह थोड़ा महँगा हो सकता है।

आप यकीन करेंगे कि 1975 में ‘बचना ऐ हसीनों …’ के गाने के लिए उनकी प्लास्टिक से बनी पोशाक पर 90,000 रुपये खर्च किए गए थे? प्लास्टिक से पोशाक बनाने का कारण सिर्फ इतना था कि अलग-अलग तरह की लाइट्स में पोशाक परदे पर चमक पैदा करे और शानदार लगे। लेकिन उन्हें यह उम्मीद नहीं थी कि वो पोशाक 90,000 की बनेगी जो उस ज़माने में बहुत बड़ी रकम थी। मज़ेदार बात ये थी कि वो लाल रंग का दिल जो उन्होंने पहना था, वो नीतू सिंह की दोस्त से उधार लिया गया था।

“मैंने नासिर साहब के साथ दो फ़िल्मों में काम किया था। मैं और भी फिल्मो में काम कर सकता था लेकिन एक अपराधबोध मुझे नासिर साहब से दूर करता चला गया। मुझे ऐसा लगा था कि मेरी वजह से “ज़माने को दिखाना है” ने वैसे सफलता नहीं पायी जैसी “हम किसी से कम नहीं” को मिली थी। मुझे लगा कि मैंने नासिर साहब की भावनाओं को आहत किया है और इसलिए उनके साथ काम नहीं करना चाहिए”

ये कहना था ऋषि कपूर का। आप यकीन कर सकते हैं कि आज के ज़माने में कोई कलाकार ऐसा सोचे?

हुसैन साहब के एक भतीजे भी इस फिल्म में काम करने वाले थे जिनका नाम था तारिक। वह उसके पहले ‘यादों की बारात’ में काम कर चुके थे। तारिक जिस परिवार के थे वो अपने ज़माने में फिल्म उद्योग में छाया हुआ था। यादों की बारात के बनते समय नासिर हुसैन साहब को तारिक़ की क़ाबलियत पर बहुत ‘ऐतबार’ था। इतना ऐतबार था कि ‘आपके कमरे में रहते हैं …’ गीत के बीच के डायलाग भी किशोर कुमार साहब से बुलवाये थे।

समझ गए ना आप, इस ऐतबार का मतलब?

एक दिन उन्होंने तबस्सुम जी के इंटरव्यू में तारिक़ को बोलते हुए देखा। उन्होंने तारिक़ को कहा कि मियाँ, अगली पिक्चर में तुम्हे बोलने का मौका मिलेगा। और यही एक कारण था तारिक़ के बड़े रोल का ‘हम किसी से काम नहीं’ में।

इसी फिल्म की ‘सिक्स पैक मेडले’ संगीत प्रेमी आज तक नहीं भूले होंगे। उस समय तक के इतिहास में ये सबसे लंबा गीत था जो नासिर हुसैन साहब की हमेशा से खासियत रही थी। इस बेमिसाल मेडले का आइडिया भी नासिर हुसैन साहब का था। हुआ यूँ था कि एक बार वो टिफ़नी लन्दन में बैठे थे। वहाँ उन्होंने देखा कि एक के बाद एक बिना रूके डिस्को गाने बजे जा रहे हैं।

बस नासिर साहब लौट कर आये और उन्होंने अपने प्यारे पंचम को चैलेंज दे डाला। चैलेंज था एक डिस्को गीत की रचना जिसमे एक नहीं, दो नहीं बल्कि टिफनी वाले गीत की तर्ज़ पर पाँच या छह गीत हो। पंचम मुस्कुराये, उन्होंने अपने साथियों के साथ मशविरा किया और जुट गए उस गीत की रचना में जिनमें केरसी लार्ड का योगदान कुछ ख़ास था। कुछ दिनों बाद पंचम और उनकी टीम ने पेश किया ये शानदार मेडले जो करीब आज ४० साल बाद भी नया-नवेला और अलबेला ही है।

नासिर हुसैन साहब ने कब शंकर जयकिशन को छोड़ कर पंचम का हाथ थामा था, वो कहानी किसी और दिन …

सुनिएगा इसे हैडफ़ोन के साथ …

लेखक मुख्य रूप से भावनात्मक कहानियाँ और मार्मिक संस्मरण लिखते हैं। उनकी रचनाएँ आम बोलचाल की भाषा में होती हैं और उनमें बुंदेलखंड की आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक का मानना है कि उनका लेखन स्वयं की उनकी तलाश की यात्रा है। लेखक ‘मंडली.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी रचनाएँ 'ऑप इंडिया' में भी प्रकाशित होती रही हैं। उनके प्रकाशित उपन्यास का नाम 'रूही - एक पहेली' है। उनका एक अन्य उपन्यास 'मैं मुन्ना हूँ' शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है। लेखक एक फार्मा कम्पनी में कार्यरत हैं।

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