मंडली

आस के चार बूँद

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हवाई जहाज में पंकज कभी उड़ान से भी उँचा उड़ने लगता तो कभी पाताल में गोता लगा बैठता। अपनी खुशी में वह परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए लिये गये उपहार के बारे में सोचता। पत्नी और भाभी के लिए उसने सोने का सिक्का ही ले लिया था ताकि वे मनपसंद गहना गढ़वा सकें। तीन साल के बेटे के लिए उसने न जाने कितने सामान खरीदे थे। भतीजे बिट्टू का हेडफोन कान में लगाए ही बैठा था। बाबूजी का मनपसंद खजूर भी लिया था किन्तु इस आशंका में उसका दिल बैठ जाता कि दुबई में कहीं उसे भी तो कोरोना नहीं हो गया। वह कभी सर पर हाथ रखता, कभी यह जाँचता कि खराश तो नहीं। उमंग में इतराते और आशंका में डूबते वह दिल्ली पहुँचा।

दिल्ली एयरपोर्ट पर धक-धक करते दिल से पंकज थर्मल स्क्रीनिंग के लिए गया। वहाँ सफल रहा तो थोड़ा हल्का हुआ पर आशंका दिमाग से निकल नहीं रही थी। कभी पत्नी का फोन आता तो कभी भैया का। एयरपोर्ट से बाहर आकर वह बिट्टू से मिला। बिट्टू की पढ़ाई-लिखाई का हाल-चाल पूछ कर वह पटना की फ्लाइट में बैठ गया। पटना एयरपोर्ट पर थर्मल स्क्रीनिंग क्लियर करके सेनेटाइजर हथेलियों पर रगड़ते हुए वह बाहर निकला। भैया किराये की टाटा सुमो गाड़ी लिए खड़े थे। तीन घंटे में वह घर पहुँच गया। गाँव में कोरोना पर सुगबुगाहट थी पर वैसा कोई खौफ नहीं दिखा।

घर में सब खुश थे। बाबूजी बबुआ को गोद में लिये पंकज से बतिया रहे थे। भैया-भाभी भी वहीं बैठे थे। चार साल की नयी दुल्हन पंकज की पत्नी प्रतिभा पर्दे की ओट से सब कुछ सुन रही थी। उसे यह बात खल रही थी कि पंकज अब तक उसके घर में नहीं आया और न ही उसने बबुआ को गोद में लिया। वह बबुआ को दूर से देखकर खुश होता और प्रतिभा को भी कभी-कभी कनखियों से देख लेता। शेष लोगों से भी वह दूर-दूर ही रहता।

शाम में सब बरामदे में बैठे थे। प्रतिभा अपनी जेठानी के साथ रसोई में खीर-पूड़ी पका रही थी। पंकज बोला, “क्वोरंटीन के तहत मैं कुछ दिन घर की जगह दालान में रहूँगा।“ बाबूजी नाराजगी में बोले, “काहे हो। तहरा कुछो नइखे भईल।“ भैया ने भी बाबूजी का समर्थन किया लेकिन पंकज नहीं माना। वह भोजन करके दालान में चला गया।

दालान में पंकज सिर्फ प्रतिभा के बारे में ही सोचता रहा। अरब की नौकरी के कारण चार साल की शादी में बमुश्किल 60 दिन ही गुजारे थे उसके साथ। पिछले साल 16 मार्च को माँ के श्राद्ध के बाद वह दुबई गया था। इस साल 19 मार्च को आया है पर प्रतिभा से बात करना तो दूर उसे ठीक से देख भी नहीं पाया। प्रतिभा की स्थिति सोचकर वह व्यग्र हो रहा था। उधर प्रतिभा बबुआ को सुलाकर कभी चूड़ियाँ गिनती तो कभी पंकज की फोटो देखती। आधी रात को उसने पंकज को फोन किया, “ए जी, तनी बाहर आइए ना।“ पंकज कान में फोन लगाये बाहर निकला और प्रतिभा भी फोन लिए खिड़की से चुपचाप देखती रही। दोनों फोन लाइन पर थे पर कुछ बोल नहीं रहे थे। पंकज जालीदार खिड़की से छनकर आते नेह से तृप्त हो रहा था और प्रतिभा दिन भर न देख सकने की भरपाई कर रही थी। नेह ने देह की माँग की। पंकज घर की ओर चल पड़ा। लजाती-सकुचाती प्रतिभा पलंग पर जा बैठी। रात खत्म हुई पर बात नहीं। तन्द्रा तब टूटी जब सुबह में बबुआ रोने लगा।

अगले 4-5 दिन पंकज बबुआ संग खेलता रहा, प्रतिभा से बतियाता रहा। गाँव के दोस्तों संग घूमता और खाता-पीता रहा। कोरोना अब भारत में पूरी तरह आ चुका था। कोरोना से लड़ने का संकल्प लिए जनता कर्फ्यू लगा। एक-दो दिन में संपूर्ण भारत में लॉकडाउन की घोषणा हो गयी।

लॉकडाउन की पहली सुबह नाश्ता करते हुए पंकज ने प्रतिभा से कहा, “मैं अच्छा फील नहीं कर रहा हूँ। खाने का मन भी नहीं हो रहा।“ प्रतिभा ने सिर पर हाथ रखकर कहा, “बुखार तो नहीं है। गैस की दवा खा लीजिए और आराम कीजिए।“ प्रतिभा काम में लग गयी और पंकज घर में लेट गया। घंटा भर बाद उसने जोर से पुकारा, “प्रतिभा!” प्रतिभा भागती हुई आई। उसने पाया कि पंकज की आँखें बंद हैं और वह सीने की दर्द से कराह रहा है। लॉकडाउन की दुश्वारियों के बीच भैया डॉक्टर के यहाँ भागे। पंकज की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। वह हकलाते हुए बोला, “लगता है कि …।” बुरी तरह घबरायी प्रतिभा कभी सिर सहलाती तो कभी तलवे। पंकज फिर बोला, “मैं बचूँगा नहीं।“ प्रतिभा जोर-जोर से रोने लगी। बाबूजी बदहवास कभी डॉक्टर को देखने दुआर पर जाते तो कभी कमरे में आते। पंकज के अंतिम शब्द फूटे, “प्रतिभा, तुम घबराना मत। बिट्टू सब कुछ …।” दूसरा वाक्य अधूरा रहा और पंकज की साँसों का चक्र पूरा हो गया।

प्रतिभा निर्विकार प्रतिमा बनी पंकज की लाश के पास बैठी थी। बाबूजी बार-बार बेहोश हो जाते। भाभी ने फोन करके एक डॉक्टर से दूसरे के पास जाते भैया को वापस बुलाया। आते ही भाभी ने उन्हें वहाँ से चलने को कहा, “उनको कोरोना हुआ था।“ भैया भड़के लेकिन थोड़ी देर में समर्पण कर गये। वे दोनों दालान में चले गये। बाबूजी बबुआ को गोद में लिए रोते रहे। कोरोना के डर से कोई पट्टीदार नहीं आया। घंटों बाद बाबूजी की करुण गुहार पर प्रशासनिक हस्तक्षेप से लाश को क्रिया-कर्म के लिए ले जाया गया। कैसे, यह मत पूछिए। बस यूँ समझिए कि चार कंधे नहीं थे।

पंकज के परिवार का पूरे गाँव ने बहिष्कार कर दिया। गाँव सील हो गया। प्रतिभा के माँ-बाबूजी आए लेकिन सीलिंग को भेद नहीं पाए। दिल्ली में बिट्टू को यह दुखद समाचार मिला। बेचैन बिट्टू लॉकडाउन में आने के वैध रास्ते खोजने लगा। दो दिन हाथ-पैर मारकर वह असफल रहा। तीसरे दिन भिनसार वह छुपते-छुपाते दिल्ली स्टेशन से एक मालगाड़ी में बैठ गया। लखनऊ में उसे जीआरपी ने पकड़ लिया लेकिन उसकी बात सुनकर पुलिस ने ही उसके दूसरी मालगाड़ी से छपरा पहुँचने का प्रबंध कर दिया।

बिट्टू घर पहुँचा। दुआर पर बैठे बाबा को प्रणाम किये बिना वह चाची के पास गया, “चाची, मैं आ गया हूँ।“ कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली तो वह भागकर बाबा के पास आया और उसने बबुआ को सीने से लगा लिया। मम्मी-पापा के दालान में होने का पता चलते ही वह उनके पास पहुँचा और बोला, “चाचा ने मुझे इंजीनियर बनाया। एल एंड टी की नौकरी छुड़वा कर मेरी इच्छा देखकर यूपीएससी की तैयारी करने भेजा। चाचा नहीं रहे। मेरा शेष जीवन चाची और बबुआ के लिए है। कोरोना से मर जाने का भी कोई डर नहीं। आप दोनों यहीं सुरक्षित रहिये।“ बिट्टू वापस घर की ओर भागा, उसके पीछे उसके पापा और सबसे पीछे उसकी माँ।

श्राद्ध संपन्न हुआ। कोरोना फैला जा रहा था। गाँव के दबाव में पंकज के परिजनों का टेस्ट हुआ। आशंकाओं को झूठ सिद्ध करते हुए सब के सब निगेटिव पाए गए। एक डेढ़ महीने बाद ‘कोरोना से जीतना है’ से ‘कोरोना के साथ जीना है’ का फेज आ गया। गाँव में अनेक लोग बाहर से आए। कई लोग कोरोना से पीड़ित हुए। प्रमोद के घर वालों ने सावधानी रखी पर किसी से कोई भेदभाव नहीं किया।

समय के सार्वभौमिक एंटीसेप्टिक से घाव धीरे धीरे भरना शुरू हुआ। एक दिन प्रतिभा ने बिट्टू को बताया कि उसने मार्च में गाँव के स्कूल में पंचायत शिक्षक के लिए आवेदन किया था। बिट्टू इसके लिए भाग-दौड़ करने लगा। एक दिन उसने निराश होकर प्रतिभा से कहा, “2 लाख रुपया घूस लगता है।“ प्रतिभा अपने गहने बेचने की बात करते हुए बोली, “माँ कहती थीं कि गहना संपत के सिंगार हs आ विपत के आधार।“ बिट्टू ने उसे सिरे से खारिज कर दिया, “पैसे का इन्तजाम मैं करुँगा। सूद पर कर्ज लूँगा और नौकरी करके लौटा दूँगा।“ प्रतिभा रोते हुए बोली, “तुम नौकरी नहीं, यूपीएससी की तैयारी करोगे। तुम्हें पता है कि तुम्हारे चाचा का अंतिम वाक्य अधूरा था – बिट्टू सब कुछ …। मतलब यह था कि बिट्टू सब कुछ सँभाल लेगा। तुम सब सँभालना लेकिन वो बनकर जो वे तुम्हें बनाना चाहते थे।“ 24 साल का मर्द बिट्टू फूट फूट कर नहीं चिल्लाकर रोने लगा।

एक दिन प्रतिभा के माँ-पापा आये। रूदन-क्रन्दन के बीच प्रतिभा के पापा ने हिम्मत करके अपनी बात रखी, “बेटी, हम तुमको लेने आए हैं। हमको लोग भात-भईअधी से भले ही छाँट दें पर हम तुम्हारा दूसरा …” प्रतिभा संयत भाव से बोली, “पापा, वैसी भईअधी की क्या चिन्ता जो मेरे पति के अंतिम कर्म में नहीं आयी और डिटॉल से कुल्ला कर रही थी। लेकिन आप आगे की बात मत सोचिए। पति वह थे, नहीं रहे। अब कोई और नहीं हो सकता। औरत को मर्द का सहारा ही चाहिए तो बेटा है। और मेरे तो दो-दो बेटे हैं। उन्हें वो बनाउँगी जो वे होते तो बनाते।“ आँसुओं की बारिश फिर हुई।

टीवी पर ‘न्यू नॉर्मल’ आ गया। दुनिया की भागदौड़ और कोरोना की रफ्तार कदमताल कर रहे थे। बिट्टू अपने दोस्तों के साथ चाची की नौकरी के लिए लॉबिंग कर रहा था। गाँव और मुखिया ने उसका भरपूर साथ दिया, शायद पंकज के परिवार के साथ किए गये भेदभाव का आंशिक पश्चाताप किया। प्रखंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) पर दबाव बनाया गया। प्रतिभा के अच्छे अंक थे। उसकी काउंसिलिंग हुई और बीईओ ने उसकी नियुक्ति की संस्तुति जिला शिक्षा पदाधिकारी को भेज दी। अब प्रतिभा की नियुक्ति में औपचारिकता भर शेष थी।

बस्ते में कपड़ों से अधिक प्रतिभा की हिदायतें बाँधे बिट्टू दिल्ली जाने को तैयार था। बबुआ उसके कंधे पर बैठा इस बात से बेखबर था कि बिट्टू आज जाने वाला है।  बिट्टू ने अपने माँ-पापा और बाबा को प्रणाम किया। अंत में प्रतिभा के पैर छुते हुए वह बोला, “चाची, मैं चाचा के उस विश्वास का ऋणी हूँ जो उन्होंने मुझमें अंतिम समय में जताया था। मैं यूपीएससी पास करके लौटूँगा। आप बबुआ का ध्यान रखिएगा।“ बिट्टू बबुआ को चाची की गोद में देकर घर से बाहर निकला। बबुआ रोने लगा। प्रतिभा की आँखों से आस के चार बूँद टपक पड़े।

लेखक गद्य विधा में हास्य-व्यंग्य, कथा साहित्य, संस्मरण और समीक्षा आदि लिखते हैं। वह यदा कदा राजनीतिक लेख भी लिखते हैं। अपनी कविताओं को वह स्वयं कविता बताने से परहेज करते हैं और उन्हे तुकबंदी कहते हैं। उनकी रचनाएं उनके अवलोकन और अनुभव पर आधारित होते हैं। उनकी रचनाओं में तत्सम शब्दों के साथ आंचलिक शब्दावली का भी पुट होता है। लेखक ‘लोपक.इन’ के लिए नियमित रुप से लिखते रहे हैं। उनकी एक समीक्षा ‘स्वराज’ में प्रकाशित हुई थी। साथ ही वह दैनिक जागरण inext के स्तंभकार भी हैं। वह मंडली.इन के संपादक है। वह एक आइटी कंपनी में कार्यरत हैं।

6 thoughts on “आस के चार बूँद

  1. आपके इस लेख पर मैं क्या लिखूं !
    पहले आँख तो पोछ लूँ !! 👌👌🙏

    1. बहुत बहुत धन्यवाद। इसमें दूसरा भाग लिखने की गुंजाइश नहीं दिख रही मुझे। बहरहाल, कोरोना ऐसा विषय है और इसके आयाम इतने हैं कि ऐसी कई कहानियाँ निकल सकती है। मंडली पढ़ते रहिये, ऐसा बहुत कुछ मिलेगा।

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